प्रबोध  

 जब ख़त्म हुई परीक्षा

मौत से लिपट आए

जहाँ छुपी थी मासूमियत 

वहाँ कभी ना लौट पाए

लुटा करअसीम उर्जा

बड़े खुद को झुकाए ||

 

दूर बेमंज़िल चलता रहा

माटी के गीत गुनगुनाए

बदलता रहा ठिकाना

अपनो को माने पराए

सुनाता अपनी कहानियाँ

बिना किसी को बताए ||

 

जब मिला विश्वकर्मा

सारे दर्द मुस्कुराए

गुलदस्ते सी बनाई दुनिया

कई  ख़्वाहिशे समायें

हथियार प्यार को बनाया

फिर कभी ना पछताए ||

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