चरमवेद  

ध्वनि  की  दीवार  टूटेगी  और  शांति  के द्वार  जब  खुलेंगे,

जीवन  के  सारे  भेद  स्पष्ट  हो  जावेंगे

जलाशयों  में प्यासे  रह  ईंटो  की  किताब लिखोगे   ||

तब  फिर  अपनी  हर  बेकार  वस्तु  का  कारण  सामने  पाओगे ||

 

रावण  जब  अपनी  लिखी  रामायण  का  राम  बना,

तब  उसने  माना  महाभारत  के  गणेश

कोई  और  नहीं  हो  सकते  ||

जब  वो  रावण  था  उसका  सच  सिर्फ  वही  जानते  थे  ||

 

रामजी  ने  अगर  कभी  रावण  का  रूप  लिया,

कृष्ण ने  कभी  अगर  भीष्म  का  वेश  धरा

तो  बस  एक  रावण  की  लिखी  रामायण  में  ||

हनुमान  तो  सदा  से  ही  थे  और  हैं  राम  के  लिए ||

 

चिता को अग्नि आज बेटे नहीं बेटियां दे रही है

जो जानता है जो लिखा है

सोने की चिड़िया उसे ढूंढ रही है ||

वहीँ जहाँ बड़ा सफ़ेद कमल मीनारों से घिरा है ||

 

कानों  में  हवाएं  ढूंढ़ती  स्वराज

पागलपन  पुनर्जन्म  का  जवाब

मजदूर  के  अनंत  सफर  में  हर  रात   त्यौहार ||

वह ख्वाब  में  तारे  न  गिन पाया  न  पहचान  पाया  ||

 

जो लाशें जलीं हैं

वही जानती हैं

सड़ती लाशों के हाल ||

ब्रह्माण्ड लगता सीमित मायाजाल के बाद ||

 

जो  धर्म  के  अनुसार  तपस्या  से  मिलता

हाथ  एक  उसकी  आँखें  अनगिनत

आज  घर  घर  में  एक  कर्ण और  एक  विभीषण ||

पत्थर  में  विद्या  ढूंढता  एकलव्य  अंतिम  ||

अंतिम अभय

Advertisements

One thought on “चरमवेद  

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

w

Connecting to %s